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  • Writer's pictureMeenakshi Sharan

रंगों का त्योहार होली, इतिहास और वैज्ञानिक प्रासंगिकता।



बसंत के आगमन का पर्व होली फागुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। क्या आप जानते हैं होलाष्टक यानी होली से पहले के आठ दिनों में शुभ कार्य करना क्यों मना है?



हिन्दुओं के हर त्यौहार आते ही एक वर्ग को दौरे क्यों पड़ने लगते हैं?


होली का त्यौहार आते ही वामपंथी उदारवादी बुद्धि जीवियों को पानी के अभाव की चिंता, पर्यावरण की चिंता, रंगों से एलर्जी क्यों होने लगती है।

अपने त्योहारों और रीतियों के पीछे का ज्ञान विज्ञान और इतिहास आज प्रत्येक हिंदू को होना चाहिए ताकि उन उदारवादियों का सामना कर सके जो उसे हिन्दू संस्कृति पर ज्ञान बाँटते हैं।


प्रत्येक हिंदू प्रथा के पीछे छिपे हैं वैज्ञानिक कारण और सुंदर प्रसंग। हिंदू पर्वों के इतिहास का वर्णन अलग अलग युगों की भिन्न भिन्न कथाओं में मिलता है।

बसंत के आगमन का पर्व होली, फागुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है।

होली से पहले, फागुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं।

जानते हैं होलष्टक में माँगलिक कार्य करना शास्त्रों में क्यों वर्जित है?


क्योंकि इन आठ दिनों में आठ गृह उग्र अवस्था में रहते हैं, शुक्ल अष्टमी पर चंद्रमा, नवमी पर सूर्य, दशमी पर शनि, एकादशी पर शुक्र, द्वादशी पर बृहस्पति, त्रयोदशी पर बुध, चतुर्दशी पर मंगल और पूर्णिमा पर राहु ग्रह उग्र रहते हैं।

इस कारण से हमारी निर्णय लेने की क्षमता क्षीण हो जाती है, हमारे अनुचित निश्चय हेम आर्थिक, मानसिक अथवा शहरीरिक हानि पहुँचा सकते हैं।ये अंधविश्वास नहीं, ज्योतिष - खगोलिक विज्ञान है!


पूर्णिमा को होलिका दहन और प्रतिपदा पर रंगों की होली खेली जाती है।


पूर्णिमा को होलिका दहन और अगले दिन यानी प्रतिपदा तिथि पर रंगों की होली खेली जाती है।

लिंग पुराण में होली को फागुनिका और वराह पुराण में पटवास् विलासिनी कहा गया।

फागुन पूर्णिमा की तिथि को ही स्वयंभू मनु का भी जन्म हुआ था।


वैदिक काल में होली को होलाका कहा जाता था।

ऋषि मुनि यज्ञ में जौ की नई फसल की आहुति अर्पण किया करते थे। नव न्नेष्टि यज्ञ में सिका अन्न होल कहलाता था जो प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता था।

सिके चने को आज भी हम होल या होले ही कहते हैं।

गेहूं, मक्का, चना आदि आग में सेंककर खाने की प्रथा आज भी प्रचलित है।


सतयुग में होली


सतयुग में इसी तिथि को हिरण्यकश्यप के आदेशानुसार होलिका, प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता पर बैठ गयी थी। श्री हरि विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और अधर्म पर धर्म की विजय हुई।

होलिका दहन अपने वैज्ञानिक कारण के अलावा, उसी धर्म की जय का प्रतीक है, इस सत्य का प्रीक है कि अहंकारी का पतन निश्चित है।

इसी तिथि को शिव ने कामदेव को भस्म किया था।


हर हिन्दू प्रथा के पीछे कुछ सुंदर प्रसंग भी है।

पूर्णिमा पर प्रदोष काल में गोबर से लिपी और गंगाजल से पवित्र की गई भूमि पर लकड़ी के डंडे के आसपास कंडे सजाए जाते हैं, उस पर प्रह्लाद और होलिका की मूर्तियां रखकर उनका विधिवत पूजन किया जाता है। पूजन के पश्चात प्रह्लाद की मूर्ति को उठा लिया जाता है और होलिका दहन किया जाता है।

नारद पुराण के अनुसार प्रज्वलन के लिए बच्चे प्रसूता स्त्री के घर से अग्नि लाया करते थे।


होलिका की लपटों का पूर्व दिशा को जाना राष्ट्र की सुख समृद्धि का सूचक कहा गया है।


शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन के बदलते काल से पर्यावरण व सभी जीवों में कई प्रकार के कीटाणुओं की वृद्धि हो जाती है।जहां होलिका जलाई जाती है उसके आस पास का तापमान 62 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है


इसीलिए होलिका के शव की पूजा का भी विधान है। प्रज्ज्वलित होली की परिक्रमा करते, अग्नि में घी, धान, नींबू आदि की आहुति अर्पण करने से होलिका से निकलने वाले ताप से शरीर और पर्यावरण में उपस्थित कीटाणु नष्ट होते हैं। जाने अनजाने हिन्दू अभी भी उस प्रथा को जीवित रखे हैं।


उसी रात्रि को, अपने शरीर पर अच्छे से चादर लपेटकर, होली की बुझी आग पर खटिया रखकर उसपर सोया जाता है, ताकि रात भर में पसीने से शसरीर विषाक्त पदार्थ/ toxin मुक्त हो जाता है।

इस प्रिवेंटिव थेरेपी को होलक स्वेदा कहते हैं।

अगले दिन होलिका से रक्षा की प्रार्थना करते हुए, शरीर पर होली की भस्म धारण की जाती है।

इसे आज की भाषा में 'डीप क्लेंजिंग' कहते हैं।

द्वापर युग में होली




द्वापर युग में इसी तिथि को श्री कृष्ण ने पूतना का वध किया था।

गोकुल में श्रीकृष्ण और बलरामजी ग्वालों और गोपियों संग टेसू के पुष्पों से होली खेला करते थे।

तथ्यों के अभाव में सुंदर प्रथा, कीचड़, पानी, रासायनिक - बनावटी रंग डालने में परिवर्तित हो गई।

होली का पर्व नयी उमंगें ले कर आता है। कहीं शिव होली के रूप में, कहीं कृष्ण होली बन के तो कहीं मसान होली बन के मानव चेतना रस-रंग यानी प्रेम के आनंद से सराबोर हो जाती है।

यही शास्वत है, यही हिन्दू जीवन आधार ।













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